अचरज और दर्पण से भरे पड़े इस निष्ठुर संसार में जब मैं अपने हर्षोल्लास में मगन होता हू तभी यह संसार अपनी फटी हुई छोली से आइना नुमा कुछ निकाल कर दिखा देता है। चाहे वह भले ही पके बालों वाली भिक्षुणी के शिथिल रूप में जो काँपती हुई धरातल को अपना कर्ज़दार करती चली जाती है...सत्य तो यह है कि वह भिक्षुणी नहीं वह मेरे समाज का आइना है। जो ना चाहते हुए भी मेरी नज़रों के सामने जा बजा आकर ठहर जाता है।यह दर्पण नहीं तो क्या है? मैं उस समाज में जीता हूँ जिसमें वह बुढ़िया अगर अपने काँपते पैरों से दरबदर ना भटके तो वह भूख से मर जाए।यह अचरज नहीं तो क्या है? फिर भी सामान्यत मैं उसे टाल देता हूँ कि अब यह जीवन के अन्तिम चरण में है और कुछ ही दिन इसका जीवन शेष है।परन्तु जैसे ही मैं अपने सहमे क़दमों से आगे बढ़ता हूँ मुझे यह संसार फिर उसी आइने का दूसरा रूप दिखा देता है.... एक बच्चे के रूप में... एक फूल नुमाँ बच्ची कचरों के ढेर में कुछ ढूंढ रही है... कुछ भी... कुछ ऐसा जो सामान्य लोगों के लिये कोई मूल्य नहीं रखता..कुछ ऐसा ही तलाश रही थी वह। मेरे क़दम रुकने लग गए... दया का सागर उफान पर था...किन्तु कर भी क्या सकता हूँ...मैं भी इनसान ही ठहरा। सैकड़ों मेरी तरह आते हैं उनको भी दया आती होगी।परन्तु कुछ समय पश्चात वह भी अपनी मंज़िल की ओर बढ़ जाते हैं यह आशा करते हुए की शायद कल वह बुढ़िया और बच्ची कल ना मिलें।
परन्तु यह संभव नहीं है..शायद की बुढ़िया परलोक सिधार जाए...किन्तु यह आइने का भ्रम नहीं छूटेगा। क्योंकि कल यही बच्ची जब उसका बल जवाब दे देगा बुढ़िया के रूप में कश्कोल लिये हमारे सामने खड़ी होगी।और निरन्तर हमारे ज़मीर और हमारे समाज को आइना दिखाने का प्रयास करेगी।
नदीम जहीर खान